Saturday, 3 September 2022

श्रीगणेशगीता में योग

वरेण्य उवाच
किं सुखं त्रिषु लोकेषु देवगन्धर्वयोनिषु ।
भगवन् कृपया तन्मे वद विद्या विशारद ।।२०।।

अर्थ:- वरेण्य बोले - भगवन् ! तीनों लोकों तथा देवता और गंधर्व आदि योनियों में यथार्थ सुख क्या है ? हे विद्याविशारद ! कृपाकर आप यह मुझसे वर्णन कीजिये ।।

श्रीगजानन उवाच
आनन्दमश्नुतेऽसक्तः स्वात्मारामो निजात्मनि ।
अविनाशि सुखं तद्धि न सुखं विषयादिषु ।।२१।।

अर्थ:- श्रीगणेश जी बोले - जो अपनी आत्मा में ही रमण करते हैं और कहीं आसक्त नहीं होते, वे ही आनन्द भोगते हैं, उसीका नाम अविनाशी सुख है, विषयादिकों में (वास्तविक) सुख नहीं ।।

विषयोत्थानि सौख्यनि दुःखानां तानि हेतवः ।
उत्पत्तिनाशयुक्तानि तत्रासक्तो न तत्त्ववित् ।।२२।।

अर्थ:- विषयों से उत्पन्न हुए सुख तो दुःख के ही कारण हैं और उत्पत्ति तथा नाशवाले हैं । तत्त्ववित् उनमें आसक्त नहीं होते ।।

कारणे सति कामस्य क्रोधस्य सहते च यः ।
तौ जेतुं वर्ष्मविरहात्स सुखं चिरमश्नुते ।।२३।।

अर्थ:- काम, क्रोध आदि का कारण उपस्थित रहने पर भी जो उनके आवेगों को रोक लेता है तथा शरीर के प्रति अनासक्त होकर उन्हें जीतने का प्रयत्न करता है, वह बहुत काल तक सुख भोगता है ।

अन्तर्निष्ठोऽन्तःप्रकाशोऽत्न्तःसुखोऽन्तारतिर्लभेत् ।
असन्दिग्धोऽक्षयं ब्रह्म सर्वभूतहितार्थकृत् ।।२४।।

अर्थ:- जिनके हृदय में निष्ठा है, ज्ञान का प्रकाश है, सुख है तथा वैराग्य है, जो सब प्राणियों का हित करता है, वह निश्चय ही अक्षय ब्रह्म को प्राप्त करता है ।

जेतारः षड्रिपूणां ये शमिनो दमिनस्तथा ।
तेषां समन्ततो ब्रह्म स्वात्मज्ञानां विभात्यहो ।।२५।।

अर्थ:- जो काम क्रोधादि छहों शत्रुओं को जीत चुके हैं, जो शम और दम का पालन करते हैं, उन आत्मज्ञानियों को सर्वत्र ब्रह्म ही दिखता है ।

आसनेषु समासीनसत्यक्त्वेमान् विषयान् बहिः ।
संस्तभ्य भ्रुकुटीमास्ते प्राणायामपरायणः ।।२६।।

अर्थ:- सब बाह्य विषयों को त्यागकर एकान्त में आसन में स्थित हो, दृष्टि को भ्रूमध्यमें स्थिरकर प्राणायाम करें ।

प्राणायाममं तु संरोधं प्राणापानसमुद्भवम् ।
वदन्ति मुनयस्तं च त्रिधाभुतं विपश्चितः ।।२७।।

अर्थ:- प्राण और अपान वायुके रोकने को प्राणायाम कहते हैं, बुद्धिमान् ऋषियों ने उसके तीन भेद कहे हैं ।

प्रमाणं भेदतो विद्धि लघु मध्यममुत्तमम् ।
दशभिर्द्व्यधिकैर्वर्णैः प्राणायामो लघु: स्मृतः ।।२८।।

अर्थ:- प्रमाण भेद से प्राणायाम लघु, मध्यम और उत्तम - तीन प्रकारका है, बारह अक्षर का प्राणायाम लघु कहलाता है ।

चतुर्विंशत्यक्षरो यो मध्यमः स उदाहृतः ।
षट्त्रिंशल्लघुवर्णो यः उत्तमः सोऽभिधीयते ।।२९।।

अर्थ:- चौबीस अक्षरों का मध्यम और छत्तीस अक्षरों का उत्तम कहा जाता है । 

सिहं शार्दूलकं वापि मत्तेभं मृदुतां यथा ।
नयन्ति प्राणिनस्तद्वत्प्राणापानौ सुसाधयेत् ।।३०।।

अर्थ:- सिंह, व्याघ्र अथवा मतवाले हाथी को जैसे मनुष्य नम्र करके अपने अधीन करता है, इसी प्रकार प्राण और अपान वायु को साधना चाहिये ।।

पीडायन्ति मृगांस्ते न लोकान् वश्यंगतान्नृप ।
दहत्येनस्तथा वायु: संस्तब्धो न च तत्तनुम् ।।३१।।

अर्थ:- हे राजन् ! जिस प्रकार अपने वश में हुए सिंहादि मृगों को सताते हैं , किन्तु वश में करने वाले लोगों को पीड़ा नहीं देते, इसी प्रकार यह वायु प्राणायाम से स्थिर होकर पापों को भस्म करता है , परन्तु शरीर को नहीं जलाता । 

यथा यथा नरः कश्चित्सोपानावलिमाक्रमेत् ।
तथा तथा वशीकुर्यात्प्राणापानौ हि योगवित् ।।३२।।

अर्थ:- जिस प्रकार क्रम से मनुष्य सीढ़ियों पर चढ़ता है , उसी प्रकार योगी के लिये क्रमसे प्राणापान को वशमें करना उचित है ।

पुरकं कुंभकं चैव रेचकं च ततोऽभ्यसेत् ।
अतीतानागतज्ञानी ततः स्याज्जगतीतले ।।३३।।

अर्थ:- पूरक- रेचक और कुम्भक का अभ्यास कर के यह प्राणी इस जगत में भूत, भविष्य तथा वर्तमान तीनों कालका ज्ञाता हो जाता है ।

प्राणायामैर्द्वादशभिरुत्तमैर्धारणा मता ।
योगस्तु धारणे द्वे स्याद्योगीशस्ते सदाभ्यसेत् ।।३४।।

अर्थ:- बारह उत्तम प्राणायाम से धारणा होती है, दो धारणा से योग सिद्ध होता है , योगी निरन्तर धारणा का अभ्यास करे ।

एवं यः कुरुते राजंस्त्रिकालज्ञ: स जायते ।
अनायासेन तस्य स्याद्वश्यं लोकत्रयं नृप ।।३५।।

अर्थ:- हे राजन् ! जो इस प्रकार साधना करते हैं , उन्हें त्रिकाल का ज्ञान हो जाता है, और अनायास त्रिलोक उनके वश में हो जाता है ।

ब्रह्मरूपं जगत्सर्वं पश्यति स्वान्तरात्मनि ।
एवं योगश्च संन्यासः समानफलदायिनौ ।।३६।।

अर्थ:- वह अपने अन्तरात्मामें सब जगत को ब्रह्मरूप देखता है । इस प्रकारसे कर्मसंन्यास और कर्मयोग दोनों समान फल के देने वाले हैं ।

जन्तुनां हितकर्तारं कर्मणां फलदायिनम् ।
मां ज्ञात्वा मुक्तिमाप्नोति त्रैलोक्यस्येश्वरं विभुम् ।।३७।।

अर्थ:- सब प्राणियों के हितकारी और कर्म का फल देनेवाले एवं त्रिलोकी के व्यापक मुझ ईश्वर को जान कर मनुष्य मुक्त हो जाते हैं ।

श्रीगणेश गीता, अध्याय ४, श्लोक २०-३७

Friday, 2 September 2022

खेचरी मुद्रा



मुद्रैषा खेचरी प्रोक्ता भक्तानां अनुरोधतः ।
सिद्धिनां जननी ह्येषा मम प्राणाधिके प्रिये ।
निरन्तर कृताभ्यासम् पीयूषम् प्रत्यहं पीवेत् ।
तेन निग्रहम् सिद्धिस्यात् मृत्यु मातंग केशरी ।।

अर्थात् - (शिव जी ने देवी से कहा) हे प्रिये ! भक्तों के अनुरोध के कारण ही मैंने अपने प्राणों से प्रिय इस खेचरी मुद्रा को प्रकाशित किया जो सिद्धियों को जन्म देने वाली माता समान है । जो इसको निरन्तर अभ्यास करता है वह नित्य ही अमृत का पान करता है और निग्रह की (मृत्यु ; मानसिक अस्थिरता और इंद्रियों के वहिर्मुखी स्वभाव से मुक्ति की) सिद्धि होती है , और मृत्यु को वह ऐसे जीत लेता है जैसे सिंह और हाथी की लड़ाई में सिंह विजयी होता है ।

कपाल कुहरे जिह्वा प्रविष्टा विपरीतगा ।
भ्रुवौ: अन्तर्गता दृष्टि मुद्रा भवति खेचरी ।

अर्थात् - कपाल के गर्त में जिह्वा को विपरीत दिशा में प्रवेश करा कर दोनो भौं के बीच भेद करके जाने बाली दृष्टि रखने से वो खेचरी मुद्रा बनती है ।

चित्तं चरति खे यस्य जिह्वां चरति खे यतः ।
तेनेया खेचरी मुद्रा सर्व सिद्ध नमस्कृता ।।

अर्थात् - जिसकी चेतना शून्य में विचरण कर रही हो , जिसकी  जिह्वा शून्य में उठगयी हो, वही खेचरी मुद्रा है जिसे सारे सिद्ध प्रणाम करते हैं ।

लावण्यं  च भवेत् गात्रे समाधि: जायते ध्रुवं ।
कपालवक्त्र संयोगे रसना रसमाप्नुयात् ।।

अर्थात् -  कपाल और मुख के इस संयोग से जिह्वा में दिव्य रसों की अनुभूति होती है, शरीर में लावण्य की वृद्धि होती है तथा समाधि होती ही है ।

मनः स्थिरं यस्य बिनावलम्बनम् ।
वायु स्थिरो यस्य बिनावरोधनम् ।
दृष्टि स्थिरा यस्य बिनावलोकनम् ।
स एव मुद्रा विचरन्ति खेचरी ।।

अर्थात् - बिना किसी आधार के जब मन स्थिर हो जाए , बिना अवरोध के बिना रोके जब वायु (श्वास) अपने आप स्थिर हो जाए , दृष्टि स्थिर हो किन्तु किसीको देख न रहा हो, स्थूल जगत से दृश्य संबंधी संवेदनाओं का अभाव हो; ऐसी जो स्थिति , उसको खेचरी मुद्रा जानो ।

न रोगो मरणं तस्य न निद्रा न क्षुधा तृषा ।
न च मूर्च्छा भवेत् तस्य यो मुद्रा वेत्ति खेचरीं ।

अर्थात् - जो खेचरी मुद्रा को जानता है , उसके लिए न रोग है, न मरण, न निद्रा है, न क्षुधा और तृष्णा है और न किसी प्रकार की मूर्च्छा है ।

जरामृत्युगदघ्नो यः खेचरी वेत्ति भूतले । 
ग्रंथतः च अर्थतः चैव तदभ्यास प्रयोगतः ।
तं मुने सर्वभावेन गुरु गत्त्वा समाश्रयेत् ।।

अर्थात् - ग्रन्थ से, अर्थ से और अभ्यास से जो जरा, मृत्यु तथा व्याधि विनाशक इस खेचरी मुद्रा को जानता हो, उसी गुरु से आश्रय ग्रहण कर इस विद्या का अभ्यास करना चाहिए ।

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Thursday, 1 September 2022

शिव संहिता में महामुद्रा

शिव संहिता में महामुद्रा

महामुद्रां प्रवक्ष्यामि तन्त्रेऽस्मिन्मम वल्लभे ।
यां प्राप्य सिद्धाः सिद्धि च कपिलाद्याः पुरागताः ।। 26 ।।

(शिवजी ने कहा) - हे प्रिये ! में इस तन्त्र में महामुद्रा की बात कहूंगा , जिसे प्राप्त करके कपिल आदि प्राचीन सिद्ध ऋषियों ने सिद्धि प्राप्त की थी ।

अपसव्येन संपीड्य पादमुलेन सादरम् ।
गुरुपदेशतो योनिं गुदमेढ्रान्तरालगाम् ।।27।।
सव्यं प्रसारितं पाद धृत्वा पाणियुगेन वै ।
नव द्वाराणि संयम्य चिबुकं हृदयोपरि ।। 28 ।।
चित्तं चित्तपथे दत्त्वा प्रभवेद्वायुसाधनम् ।
महामुद्रा भवेदेषा सर्वतन्त्रेषु गोपिता ।। 29 ।।
वामाङ्गेन समभ्यस्य दक्षाङ्गेनाभ्यसेत्पुनः ।
प्राणायामं समं कृत्वा योगी नियतमानसः ।। 30 ।।

गुरु उपदेश अनुसार बाएँ पैर के एड़ी को गुद (मलद्वार) एवं मेढ़्र (जननाङ्ग) के मध्यस्थ योनि स्थान में लगाकर दवाएं । दायाँ पैर सीधा फैला कर उसे दोनों हाथ से पकड़ लें। शरीर के नवद्वारों को संयमित कर चिबुक (ठुड्डी) को हृदय पर स्थापित करें । चित्त को चित्तपथ में लगाकर वायु की साधना करें । यह महामुद्रा कहलाती है, जिसे सभी तन्त्रों में गोपनीय कहा गया है । इसे पहले वामाङ्ग में अभ्यास करके पुनः दक्षिणाङ्ग में अभ्यास करें । संयत चित्त वाले योगी को चाहिए कि, इस प्रकार से प्राणायाम को सम करे ।

अनेन विधिना योगी मन्दभाग्योऽपि सिध्यति ।
सर्वसामेव नाड़ीनां चालनं बिन्दुमारणं ।। 31 ।।
जीवनं तु कषायस्य पातकानां विनाशनम् ।
कुण्डलीतापनं वायोर्ब्रह्मरन्ध्रेप्रवेशनम् ।। 32 ।।

इस विधि से (महामुद्रा से) मन्दभाग्य (हतभाग्य) योगी भी सिद्धिलाभ करलेता है । इसके प्रभाव से समस्त नाड़ियों का परिचालन होकर बिन्दुमारण (बिन्दु/वीर्य का स्थिरीकरण) होता है । इसके द्वारा कुण्डलिनी को जगाकर वायु को ब्रह्मरन्ध्र में प्रवेश कराने की क्षमता प्राप्त होती है / कुण्डलिनी जाग्रत हो कर वायु ब्रह्मरन्ध्र में प्रवेश करता है ।

सर्वरोगोपशमनं जठाराग्निविवर्धनम् ।
वपुषा कान्तिममलां जरामृत्युविनाशनम् ।। 33 ।।
वांछितार्थफलंसौख्यंमिन्द्रियाणाञ्च मारणम् ।
एतदुक्तानि सर्वाणि योगारूढ़स्य योगिनः ।
भवेदभ्यासतोऽवश्यं नात्र कार्या विचारणा ।। 34 ।।

इसके अभ्यास से सभीरोगों का प्रशमन होता है, जठाराग्नि की वृद्धि होती है । शरीर में अमल कान्ति उत्पन्न होती है तथा जरामृत्यु आदि का विनाश होता है । समस्त अभिलषित वस्तुओं की तथा सुख की प्राप्ति होती है एवं इन्द्रिय मारण (इन्द्रिय संयम) होता है । इसमें कहे गए लाभ योगारूढ़ योगी को अवश्य प्राप्त होते हैं । अभ्यास से अवश्य ही इनकी उपलब्धि होती है, इसमें सोच विचार करने की आवश्यकता नहीं है ।

गोपानीया प्रयत्नेन मुद्रेयं सुरपूजिते ।
यान्तु प्राप्य भवाम्भोधेः पारं गच्छन्ति योगिनः ।। 35 ।।
मुद्रा कामदुघा ह्येषा साधकानां मयोदिता ।
गुप्ताचारेण कर्तव्या न देया यस्य कस्यचित् ।। 36 ।।

हे देव पूजिता ! आप इस मुद्रा को प्रयत्न के साथ गोपनीय रखना। इसकी उपलब्धि से योगीजन भवसागर को पार कर जाते हैं । 
मेरे द्वारा प्रकशित यह मुद्रा साधकों के लिए कामधेनु है (सभी इच्छाओं की पूर्ति करने वाली)। इसे गुप्तरूप से साधन करना चाहिए तथा किसी अयोग्य अनाधिकारी व्यक्ति को नहीं देनी चाहिए ।।

Keywords:- Mahamudra, Shiva Samhita, महामुद्रा, शिव संहिता

योगबल से शरीर त्याग कैसे हो ? How to leave body by Yoga

योगबल से कैसे शरीर त्यागना है उसको गीता में भगवान बताते हैं । प्रयाणकाले मनसाऽचलेन भक्त्या युक्तो योगबलेन चैव। भ्रुवोर्मध्ये प्राणमावेश्य सम...